क्या है पूना पैक्ट?
जब गांधीजी के सामने अंबेडकर ने रोते हुए पूना पैक्ट पर हस्ताक्षर किए
कहा जाता है कि महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) के अनशन की वजह से मजूबर होकर बड़े बेमन से डॉ भीमराव अंबेडकर (Dr. Bhimrao Ambedkar) ने पूना पैक्ट (Poona Pact) पर हस्ताक्षर किए थे...
1932 में आज ही के दिन पूना पैक्ट (Poona Pact) पर हस्ताक्षर हुए थे. पुणे की यरवदा जेल में बंद महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) और डॉ भीमराव अंबेडकर (Dr. Bhimrao Ambedkar) के बीच दलितों के अधिकार और उनके हितों की रक्षा के लिए पूना पैक्ट हुआ था. पूना पैक्ट की वजह से देश की बड़ी दलित, शोषित और वंचित आबादी पर प्रभाव पड़ा. कहा जाता है कि बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने बड़े बेमन से इस पैक्ट पर हस्ताक्षर किए थे
क्या है पूना पैक्ट?
भीमराव अंबेडकर भारत के दलित, शोषित और वंचित तबके को अधिकार दिलाने के लिए लंबे वक्त से लड़ रहे थे. अंग्रेजों ने भी अपने शासनकाल में देखा था कि हिंदू धर्म में अछूत समाज के साथ कैसा अमानवीय व्यवहार हो रहा है. आजादी मिलने से काफी पहले 1908 से ही अंग्रेजों ने अपने प्रशासन में कम भागीदारी वाले जातियों को बढ़ाने के प्रयास शुरू कर दिए थे. हालांकि ये भी कहा जाता है कि ऐसा करके दरअसल अंग्रेज हिंदू धर्म को बांटने की साजिश रच रहे थे.
भारत सरकार अधिनियम 1909 में अछूत समाज के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया. इसके बाद बाबा साहब के प्रयासों की वजह से ब्रिटिश सरकार ने अलग-अलग जाति और धर्मों के लिए कम्यूनल अवॉर्ड की शुरुआत की. 1928 में साइमन कमीशन ने भी माना था कि भारत के शोषित समाज को शासन में पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए.
इन प्रयासों के बाद 17 अगस्त 1932 को ब्रिटिश सरकार ने कमिनुअल अवॉर्ड की शुरुआत की. इसमें दलितों को अलग निर्वाचन का स्वतंत्र राजनीतिक अधिकार मिला. इसके साथ ही दलितों को दो वोट के साथ कई और अधिकार मिले. दो वोट के अधिकार के मुताबिक देश के दलित एक वोट से अपना प्रतिनिधि चुन सकते थे और दूसरे वोट से वो सामान्य वर्ग के किसी प्रतिनिधि को चुन सकते थे.
बाबा साहब का मानना था कि दलितों को दो वोट का अधिकार उनके उत्थान में बहुत बड़ा कदम साबित होता. इसके साथ ही मैकडोनाल्ड अवॉर्ड में दलितों को शासन-प्रशासन और न्यायपालिका में बराबर की हिस्सेदारी देने की बात भी थी
दलित अधिकारों के विरोधी क्यों बन गए गांधी ?
महात्मा गांधी दलितों को दिए इन अधिकारों के विरोध में थे. महात्मा गांधी का मानना था कि इससे हिंदू समाज बंट जाएगा. महात्मा गांधी दलितों के उत्थान के पक्षधर थे लेकिन वो दलितों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र और उनके दो वोट के अधिकार के विरोधी थे. महात्मा गांधी को लगता था कि इससे अछूत (दलित) हिंदू धर्म से अलग हो जाएंगे. हिंदू समाज और हिंदू धर्म विघटित हो जाएगा.
इसके विरोध में पहले महात्मा गांधी ने अंग्रेज शासन को कई पत्र लिखे. लेकिन उससे भी बात नहीं बनी तो महात्मा गांधी ने पुणे की यरवदा जेल में आमरण अनशन शुरू कर दिया. उन्होंने कहा कि वो अछूतों के अलग निर्वाचन के विरोध में अपनी जान की बाजी लगा देंगे. महात्मा गांधी के इस कदम से बाबा साहब भीमराव अंबेडकर दुखी थे. वो इसे अछूतों के उत्थान में मजबूत कदम मान रहे थे. अंग्रेजों ने अछूत समाज को अलग धर्म अलग समुदाय की पहचान देने की कोशिश की थी. लेकिन पूना पैक्ट के बाद ये खत्म हो गया. हालांकि अछूतों के बड़े नेताओं ने पूना पैक्ट का विरोध किया था.
*जब बाबा साहब को विरोध के आगे झुकना पड़ा*
अनशन की वजह से महात्मा गांधी की तबीयत लगातार बिगड़ने लगे. अंबेडकर पर अछूतों के अधिकारों से समझौता कर लेने का दबाव बढ़ने लगा. देश के कई हिस्सों में भीमराव अंबेडकर के पुतले जलाए गए. उनके खिलाफ विरोध प्रदर्शन हुए. कई जगहों पर सामान्य वर्ग के लोगों ने दलितों की बस्तियां जला डालीं.
आखिर में बाबा साहब को झुकना पड़ा.
अंबेडकर ने बेमन से पूना पैक्ट पर हस्ताक्षर किए थे,
बाबा साहब भीमराव अंबेडकर 24 सितंबर 1932 को शाम 5 बजे पुणे की यरवदा जेल पहुंचे. यहां महात्मा गांधी और बाबा साहब अंबेडकर के बीच समझौता हुआ, जिसे पूना पैक्ट कहा गया. कहा जाता है कि बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने बेमन से रोते हुए पूना पैक्ट पर हस्ताक्षर किए थे. इस समझौते में दलितों के लिए अलग निर्वाचन और दो वोट का अधिकार खत्म हो गया. इसके बदले में दलितों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या प्रांतीय विधानमंडलों में 71 से बढ़ाकर 147 और केंद्रीय विधायिका में कुल सीटों की 18 फीसदी कर दी गई.
पूना पैक्ट का अछूत समाज के बड़े नेताओं ने विरोध किया था. बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम ने पूना पैक्ट के बाद के युग को चमचा युग कहा था. उन्होंने पूना पैक्ट के 50 साल पूरे होने पर 23 सितंबर 1982 को अपनी एक किताब का विमोचन किया. किताब का नाम था- एन एरा ऑफ स्टूजेज यानी चमचा युग. कांशीराम ने लिखा था कि पूना पैक्ट की वजह से ही दलित अपने वास्तविक प्रतिनिधि चुनने से वंचित कर दिए गए. उन्हें हिंदुओं द्वारा नामित प्रतिनिधि को चुनने के लिए मजबूर कर दिया गया. ये थोपे गए प्रतिनिधि हिंदुओं के औजार या चमचे के रूप में कार्य करने के लिए मजबूर हैं. कांशीराम का मानना था कि 24 सितंबर 1932 को दलितों को चमचा युग में ढकेल दिया गया.

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