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ઉત્ક્રાંતિવાદ

 ઉત્ક્રાન્તિવાદના આદ્ય સ્થાપક ચાર્લ્સ ડાર્વિનનો જન્મ સને ૧૮૦૯ના ૧૨મી ફેબ્રુઆરીના રોજ થયેલો હતો. તે દિવસ આકસ્મિક રીતે અમેરિકામાં ગુલામી નાબુદ કરનાર કાન્તિકારી રાષ્ટ્રપ્રમુખ અબ્રાહમ લિંકનનો પણ જન્મદિવસ છે. ઉત્ક્રાન્તિવાદ શું છે? તે સમજાવે છે કે કોઈ પણ પ્રાણી વર્ગ, જાતિ વિશેષ, માનવજાત સમેતનું કોઈ ખાસ સર્જનના ફળસ્વરૂપે અસ્તિત્વમાં આવેલ નથી. કિંતુ તે કોઈને કોઈ પ્રકારના આગોતરા–પ્રાથમિક કે સાદા સ્વરૂપમાં થયેલ ક્રમિક વિકાસને પરિણામે આજની વર્તમાન સ્થિતિએ પહોંચી શક્યો છે– એવો સિદ્ધાંત કે વાદ એટલે ઉત્ક્રાન્તિવાદ. ઉપરનાં વાક્યો એમ સૂચવે છે કે સમગ્ર સજીવ સૃષ્ટિનું સર્જન કોઇ ઇશ્વરી પરિબળની ખાસ ઇચ્છા કે હેતુનું પરિણામ નથી. દરેક સજીવનું અસ્તિત્વ અને વિકાસ ક્રમશઃ, તબક્કાવાર થયેલ છે. ડાર્વિન વિશ્વનો એવો પ્રથમ જીવવૈજ્ઞાનિક હતો કે જેણે જૈવિક ઉત્ક્રાન્તિના નિયમો શોધી કાઢીને આ ક્રમિક વિકાસ સમજાવ્યો છે. આ નિયમોને કુદરતી પસંદગીના નિયમો(Laws of Natural selection) તરીકે ઓળખવામાં આવે છે. કુદરતી પસંદગીના નિયમો એટલે શું? ડાર્વિનના મત મુજબ આ નિયમો પાંચ છે. (૧) સજીવ ઉત્ક્રાન્તિ એ હકીકત છે. દરેક જૈવિક સજીવોનો જન્...
 हिंदू धर्म प्रारंभ से खोटा सिक्का था- डॉ. आंबेडकर - संदर्भ हिंदू धर्म पर आधारित हिंदू राष्ट्र और उसके नायक कैसे होंगे ! “हिदू धार्मिक और सामाजिक व्यवस्था इस प्रकार की है कि आप उसके आदर्श को वास्तविकता नहीं बना सकते, क्योंकि ये आदर्श निंदनीय हैं, न ही आप वास्तविकता को उच्चता तक की अवस्था तक    पहुंचाने का प्रयास कर सकते हैं, क्योंकि जो वास्तविकता है, अर्थात वर्तमान स्थिति है, वह तो निकृष्ट से भी निकृष्ट है।...हिंदू धर्म प्रारम्भ से ही खोटा सिक्का था। हिंदू धर्म द्वारा निर्धारित हिंदू समाज का आदर्श हिंदू  समाज पर नैतिक ह्रास और पतनशील प्रभाव डालने वाला था। वह अपने स्वरूप और सारभूत तत्व में नीत्से ( जर्मन दार्शनिक, हिटलर का प्रेरणास्रोत) के समान था। वह प्रत्येक प्रकार से नीत्शेवादी है। नीत्शे के जन्म से बहुत पहले मनु द्वारा वह सिद्धांत घोषित किया गया था, जिसका प्रचार नीत्शे ने किया। यह ऐसा धर्म है जो स्वाधीनता, समानता और भ्रातृत्व स्थापित करने पक्ष में नहीं है। यह घोषणा करता है कि हिंदू समाज में अन्यों द्वारा  मानवेत्तर ब्राह्मणों की पूजा की जाए।”     ...

ऐतिहासिक पत्र

  रमाबाई को पत्र-डाॅ.अंबेडकर : 30 दिसंबर अपनी पत्नी 'रमाबाई' को लिखा गया डाॅ.अंबेडकर का दिल छू लेने वाला ऐतिहासिक पत्र "रमा, तुम मेरे जीवन में नहीं आती तो..."-डाॅ.अंबेडकर रमा!  कैसी हो रमा तुम? तुम्हारी और यशवंत की आज मुझे बहुत याद आई। तुम्हारी यादों से मन बहुत ही उदास हो गया है। पिछले कुछ दिनों के मेरे भाषण काफी चर्चा में रहे। कॉन्फ़्रेंस में बहुत ही अच्छे और प्रभावी भाषण हुए। ऐसा मेरे भाषणों के बारे में यहां के अखबारों ने लिखा है। इससे पहले राउंड टेबल कांफ्रेंस के बारे में अपनी भूमिका के विषय पर मैं सोच रहा था और आँखों के सामने अपने देश के सभी पीड़ित जनों का चित्र उभर आया। पीड़ा के पहाड तले ये लोग हजारों सालों से दबे हुए हैं। इस दबेपन का कोई इलाज नहीं है। ऐसा ही वे समझते हैं। मैं हैरान हो रहा हूं। रमा, पर मैं लड़ रहा हूं। मेरी बौद्धिक ताकत बहुत ही प्रबल बन गई है। शायद मन में बहुत सारी बातें उमड़ रही हैं। हृदय बहुत ही भाव प्रवण हो गया है। मन बहुत ही विचलित हो गया है और घर की, तुम सबकी बहुत याद आई। तुम्हारी याद आई। यशवंत की याद आई। मुझे तुम जहाज पर छोडने आयी थी। मैं म...